Sunday, November 8, 2009
जिंदगी यूँ भी बसर होती है
ये भी भारत का नागरिक (वोटर है) जो डलाव से प्लास्टिक और लोहा बीनकर जीवन यापन करने की कोशिश कर रहा है. क्या इस नागरिक तक भारत के संविधान में दी हुई तमाम गारंटियां और पार्टियों द्वारा दिखाये गये सपने पहुंच पायेंगे? या फिर हर हाथ को काम की यही मूर्त अभिधारणा है??
Friday, November 6, 2009
विजिलेंस वीक
मुफ्त का मुर्गा उड़ाया, बोतल वो पूरी पी गये.
कार एसी में वो घूमे, रूम में जा फिर सो गये.
नोट की गड्डी संभाली, हर चीज पाई ठीक.
कुछ इस तरह निपटा गये, वो सतर्कता वीक.
कार एसी में वो घूमे, रूम में जा फिर सो गये.
नोट की गड्डी संभाली, हर चीज पाई ठीक.
कुछ इस तरह निपटा गये, वो सतर्कता वीक.
Thursday, November 5, 2009
नेता जी का ऐलान
नेताजी ने कर दिया खंभ ठोक ऐलान
तीन महीने तक नहीं गिरने वाले दाम
गिरने वाले दाम खूब स्टॉक लगाओ
करो मुनाफाखोरी चूस जनता को जाओ
कह दानव कविराय जगो अब वोटर प्यारे
कर दो इनको चित्त दिखाओ दिन में तारे
तीन महीने तक नहीं गिरने वाले दाम
गिरने वाले दाम खूब स्टॉक लगाओ
करो मुनाफाखोरी चूस जनता को जाओ
कह दानव कविराय जगो अब वोटर प्यारे
कर दो इनको चित्त दिखाओ दिन में तारे
Wednesday, October 28, 2009
ब्राण्ड नेम न लिखूं तो क्या करूं??
मेरे एक मित्र हैं सर्जन. हड्डियों के. अच्छे हैं लिहाजा खूब भीड़-भाड़ भी रहती है. पिछले दिनों मुझे कुछ तकलीफ हुई तो मैं उनके पास गया. यद्यपि मेरे घर से काफी दूर है उनका अस्पताल, लेकिन दो सौ रुपये बचाने का लोभ मैं संवार नहीं सका. ऊपर से मित्र तो हैं ही. पहुंचा, उन्होंने देखा, थोड़ी गंभीर मुद्रा बनाई, और कागज पर कुछ शब्द घसीटने लगे. मुझे लगा कि एक अदद एक्स-रे तो जरूर लिखा होगा और भी पता नहीं क्या होगा उनकी कलम से निकलता हुआ. खैर मेरे हाथ को थोड़ा पकड़ कर हिलाया-डुलाया और एक बैन्डेज लगा दिया. बोले आठ-दस दिन हाथ को आराम देना, बस. काफी का आर्डर दे चुके थे. बैठना आवश्यक था, मुझे लग रहा था कि मैं अनावश्यक रूप से उनके काम में खलल डाल रहा हूं, मैंने आशंका जताई तो वे बोले कि चलो "तू आ गया है तो कम से कम थोड़ी देर का मिल गया है, वरना वही रूटीन".
हम लोग बचपन के साथी हैं, एक दूसरे की टांग खिचाई का मौका ढूंढ ही लेते हैं. मैं ने काफी के सिप भरते भरते सवाल दाग दिया कि "अभी मेरी जगह कोई और होता तो तू क्या करता, ईमानदारी से बताना?" उत्तर मिला "एक एक्स-रे, विटामिन और कैल्सियम तथा दर्द निवारक गोलियां और बैन्डेज तो होना ही था" फिर मैंने एक सवाल और दाग दिया "तुम लोग दवाइयों के जेनेरिक नाम क्यों नहीं लिखते आखिर दवाई तो वही होती है जो उसका जेनेरिक नाम है न कि ब्राण्ड नेम?" पहला उत्तर था कि "इससे याद रखने में आसानी होती है, दवा देने वाले केमिस्ट को भी आसानी होती है और ऊपर से लोगों को भी सुविधा होती है." मैने फिर बाल की खाल निकाली तो थोड़ा सा भड़क गया बोला "साले तुम लोग हमें बेवकूफ समझते हो, तुम लोग (जिसमें मैं भी शामिल हूं) पांच रुपये की चीज पचास में खरीदते हो तो कुछ नहीं कहते, चीनी के दाम दुगुने हो जाते हैं कुछ नहीं कहते, किसान को जिस चीज के पांच रुपये मिलते हैं उसे पच्चीस में खरीदते हो, नकली दूध-तेल-घी, मिलावटी डीजल-पेट्रोल खरीदते हो कुछ नहीं कहते, सरकारे गलत काम कराती हैं, वोट देकर चले आते हो, लाला सौ ग्राम की पैकिंग के दाम में बढोत्तरी नहीं करता बस पैकिंग में कमी करता है, कभी चिल्लाये. आटो-टैक्सी वाले रेट बढा़ देते हैं कभी कुछ कहा. सरकारें खुद भी भू-माफियाओं को संरक्षण देती हैं जो किसानों की जमीन औने-पौने दामों पर बिना खरीदे ही पावर आफ अटार्नी लेकर दस हजार रुपये मीटर बेचती हैं, कभी तुम लोगों ने कोई आन्दोलन किया.
स्कूल-कालेज डोनेशन लिये वगैर अडमीशन नहीं करते, फीस अनाप शनाप बढा़ देते हैं, तुम लोगों के कभी दर्द हुआ. कम्पनी एक रुपये की लागत की चीज पचास रुपये में बेचती है. दवा कम्पनियों के ऊपर क्यों कोई शिकंजा नहीं है, क्यों पालिसियां बदल दी जाती हैं. क्या सरकारों को यह दिखाई नहीं देता? फिर मैं क्यों बेवकूफी करूं? जब सब के सब लाखों के गिफ्ट लेते हैं, कैश में काइन्ड में और भी कई तरीकों से, विदेशों के टूर लेकर, तो मैं क्यों न ब्राण्ड नेम सजेस्ट करूं, मुझे कौन सा भारत रत्न मिल जायेगा? और मेरे दोस्त यहां तक तो फिर भी ठीक है, जब यात्रा करते समय स्टेशन पर पीने को पानी नहीं मिलता तो बीस रुपये की बोतल खरीदना पड़ती है. बिजली का मीटर ठीक है, लेकिन फिर भी महीने में देना पड़ता है, नक्शा के हिसाब से बनवाया, लेकिन बीस हजार देना पड़ा. पुलिस-प्रशासन वाले आ जायें तो हर चीज में छूट देनी पड़ती है. अपना विभाग भी छूटा नहीं है. अखबार वाले भी हर दूसरे तीसरे महीने विज्ञापन लेने के लिये कारिंदा भेज देते हैं. और मुझे मकान नहीं बनाना, मुझे गाड़ी से नहीं चलना, मुझे अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा नहीं दिलानी चाहिये क्या? और ऐसा करने लगूंगा तो बाद में तू ही कहेगा कि तुझे पागल कुत्ते ने काटा था क्या? इसलिये मत पूछ कि ब्राण्ड नेम क्यों लिखता है.
हम लोग बचपन के साथी हैं, एक दूसरे की टांग खिचाई का मौका ढूंढ ही लेते हैं. मैं ने काफी के सिप भरते भरते सवाल दाग दिया कि "अभी मेरी जगह कोई और होता तो तू क्या करता, ईमानदारी से बताना?" उत्तर मिला "एक एक्स-रे, विटामिन और कैल्सियम तथा दर्द निवारक गोलियां और बैन्डेज तो होना ही था" फिर मैंने एक सवाल और दाग दिया "तुम लोग दवाइयों के जेनेरिक नाम क्यों नहीं लिखते आखिर दवाई तो वही होती है जो उसका जेनेरिक नाम है न कि ब्राण्ड नेम?" पहला उत्तर था कि "इससे याद रखने में आसानी होती है, दवा देने वाले केमिस्ट को भी आसानी होती है और ऊपर से लोगों को भी सुविधा होती है." मैने फिर बाल की खाल निकाली तो थोड़ा सा भड़क गया बोला "साले तुम लोग हमें बेवकूफ समझते हो, तुम लोग (जिसमें मैं भी शामिल हूं) पांच रुपये की चीज पचास में खरीदते हो तो कुछ नहीं कहते, चीनी के दाम दुगुने हो जाते हैं कुछ नहीं कहते, किसान को जिस चीज के पांच रुपये मिलते हैं उसे पच्चीस में खरीदते हो, नकली दूध-तेल-घी, मिलावटी डीजल-पेट्रोल खरीदते हो कुछ नहीं कहते, सरकारे गलत काम कराती हैं, वोट देकर चले आते हो, लाला सौ ग्राम की पैकिंग के दाम में बढोत्तरी नहीं करता बस पैकिंग में कमी करता है, कभी चिल्लाये. आटो-टैक्सी वाले रेट बढा़ देते हैं कभी कुछ कहा. सरकारें खुद भी भू-माफियाओं को संरक्षण देती हैं जो किसानों की जमीन औने-पौने दामों पर बिना खरीदे ही पावर आफ अटार्नी लेकर दस हजार रुपये मीटर बेचती हैं, कभी तुम लोगों ने कोई आन्दोलन किया.
स्कूल-कालेज डोनेशन लिये वगैर अडमीशन नहीं करते, फीस अनाप शनाप बढा़ देते हैं, तुम लोगों के कभी दर्द हुआ. कम्पनी एक रुपये की लागत की चीज पचास रुपये में बेचती है. दवा कम्पनियों के ऊपर क्यों कोई शिकंजा नहीं है, क्यों पालिसियां बदल दी जाती हैं. क्या सरकारों को यह दिखाई नहीं देता? फिर मैं क्यों बेवकूफी करूं? जब सब के सब लाखों के गिफ्ट लेते हैं, कैश में काइन्ड में और भी कई तरीकों से, विदेशों के टूर लेकर, तो मैं क्यों न ब्राण्ड नेम सजेस्ट करूं, मुझे कौन सा भारत रत्न मिल जायेगा? और मेरे दोस्त यहां तक तो फिर भी ठीक है, जब यात्रा करते समय स्टेशन पर पीने को पानी नहीं मिलता तो बीस रुपये की बोतल खरीदना पड़ती है. बिजली का मीटर ठीक है, लेकिन फिर भी महीने में देना पड़ता है, नक्शा के हिसाब से बनवाया, लेकिन बीस हजार देना पड़ा. पुलिस-प्रशासन वाले आ जायें तो हर चीज में छूट देनी पड़ती है. अपना विभाग भी छूटा नहीं है. अखबार वाले भी हर दूसरे तीसरे महीने विज्ञापन लेने के लिये कारिंदा भेज देते हैं. और मुझे मकान नहीं बनाना, मुझे गाड़ी से नहीं चलना, मुझे अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा नहीं दिलानी चाहिये क्या? और ऐसा करने लगूंगा तो बाद में तू ही कहेगा कि तुझे पागल कुत्ते ने काटा था क्या? इसलिये मत पूछ कि ब्राण्ड नेम क्यों लिखता है.
Friday, October 23, 2009
सेना और पार्टियों में आरक्षण क्यों नहीं है.
सिर्फ़ एक सवाल - भारत की सेना और राजनीतिक दलों में आरक्षण क्यों लागू नहीं किया जा रहा है? क्या एक साजिश नहीं है पिछडों और दलितों के विरुद्ध.
Tuesday, October 20, 2009
भारत में नब्बे प्रतिशत सरकारी कर्मचारी नौकरी से निकाल दिये जायेंगे
भारत में नब्बे प्रतिशत सरकारी कर्मचारी नौकरी से निकाल दिये जायेंगे, हैरान न हों. बात सही है. किसी भी सरकार की सेवा नियमावली को उठाकर देख लीजिये और फिर सरकारी सेवकों के कामकाज की उनसे तुलना कर लीजिये, खुद-ब-खुद पता चल जायेगा. कुछ चीजें तो प्रक्टीकल नहीं हैं, जिन्हें इनमें से हटाना चाहिये. दूसरी तरफ अपने कर्तव्यों का निर्वहन न करना किसी भी सरकारी कर्मचारी के लिये "अनबीकमिंग आफ गवर्नमेन्ट सर्वेन्ट" होता है. एक अफसर पुत्र हाल तक अपने पप्पा की बत्ती लगी सरकारी गाड़ी में स्कूल/कोचिंग जाता रहा, अब वह भी अफसर बन गया है. हाल क्या होगा, भगवान (सिकुलर क्षमा करें) ही मालिक है. एक सज्जन एक प्रमुख संस्था के मुखिया क्या बने उनकी पत्नी जो एक स्कूल में अध्यापिका हैं, को बड़ी दिक्कत हो गयी है. उन्हें भी बत्ती लगी सरकारी गाड़ी में चलना पड़ता है. गाड़ी अब उन्हें छोड़ने व लेने जाती है. बेटे को मजबूरी में गाड़ी में एसी चलाकर बैठना रहता है जब तक मम्मा नहीं आती. बेचारे.
राजेश्वरी देवी ने की आत्महत्या
राजेश्वरी देवी, आंध्रप्रदेश की एक महिला अधिकारी ने पता नहीं क्यों आत्म हत्या कर ली और दुश्मनी निकाली बेचारे नेताओं और विधायकों पर. च्च. बड़े अफसोस की बात है, अरे नेता भी कभी कोई गलत बात करता है पुलिस और प्रशासनिक अफसरों की तरह. फिर पता नहीं क्यों राजेश्वरी देवी मरते समय इन विधायक पर आरोप लगा गई कि इनके दबाव के कारण वह आत्म हत्या कर रही है. किसी साजिश की तहत यह किया है उन्होंने. है न नेताजी??? हो सकता है उसे आत्महत्या करना अच्छा लगता हो, उस महिला अधिकारी का यह शौक हो. या यह भी हो सकता हो किसी प्रकार की रंजिश निकालना चाहती हो. निर्दोष विधायक को खामखाह ही फंसाने की साजिश.
आशुतोष अस्थाना की मृत्यु और केस लगभग बन्द
आशुतोष अस्थाना, गाजियाबाद नजारत घोटाले के मुख्य अभियुक्त की मौत जेल में हो गयी. पहले परीक्षण करने वाले डाक्टर ने कहा कि प्रथम दृष्टया जहर से हुई मृत्यु लगती है. पोस्टमार्टम करने वाले ने कुछ भी नहीं बताया. डीआईजी जेल को जांच का जिम्मा दिया गया है. बड़े लोगों के नाम लिये थे अस्थाना ने. उसकी पत्नी का कहना था कि अस्थाना ने अपनी हत्या की आशंका जताई थी. जेल में क्या कुछ होता है, कैसे होता है, किनके संरक्षण में होता है, सबको पता है. सच सामने आने की सम्भावना नगण्य है. कुछ विशेष पदों को दिये गये संवैधानिक संरक्षण का पुनर्विलोकन होना चाहिये तथा इन्डियन इवीडेंस एक्ट में अविलम्ब संशोधन वांछनीय है.
आई०आई०टी० की प्रवेश परीक्षा में बैठने हेतु न्यूनतम कट-आफ बढाने का प्रस्ताव
आई०आई०टी० में प्रवेश हेतु इंटर मीडियट में अस्सी प्रतिशत अंक लाना आवश्यक होगा. वह छात्र जो किसी वजह से अस्सी प्रतिशत नहीं ला पायेंगे इस परीक्षा में बैठ नहीं पायेंगे. एक ओर जहां हाईस्कूल की परीक्षायें खत्म की जा रही हैं वहीं दूसरी तरफ इस तरह का प्रयोग. एक तो वैसे ही देश में शिक्षा सम्बन्धी सुविधायें न के बराबर हैं, ऊपर से ऐसी शर्तें. जब पहले ही केवल दो मौके दिये जाते हैं तब इस प्रकार की शर्त का कोई औचित्य समझ में नहीं आता. बल्कि मैं तो यहा तक कहूंगा कि किसी भी प्रतियोगी परीक्षा में शैक्षणिक योग्यता में साठ/सत्तर/अस्सी/नब्बे प्रतिशत न्यूनतम अंकों की सीमा नहीं होना चाहिये. यह जरूरी नहीं कि साठ प्रतिशत पाने वाला साल/दो साल में नब्बे प्रतिशत के बराबर नहीं आ सकता. दलित छात्रों के लिये विशेष तौर पर घातक. इससे बेहतर हो कि आरक्षण खत्म ही कर दें, आई०आई०टी० से. खैर ऊपर वाले तेरे हवाले पूरा देश.
एक युवक का सर फोड़ा दिल्ली में एक एस०एच०ओ० ने
पुलिस वाले कभी गलत नहीं होते, न ही वे जो करते हैं वो कभी गलत होता है. दिल्ली में एक लड़के का सर फोड़ दिया एक एस०ओ० ने जो स्वयं नशे में था. लेकिन पुलिस कभी गलत नहीं होती वह जो करती है सही करती है, इसलिये फिर वही सब होगा जो हमेशा होता आया है और वो सब कुछ सही ही होगा. न मानो तो पुलिस वालों के खिलाफ दर्ज मामलों का हश्र देख लो. कुछ दिन बाद मुद्दई खुद ही एक एफीडेविट लगा देता है कि मामला गलत था या कोई अन्य इसमें शामिल था, किसी गलती के चलते नाहक ही बेचारे पुलिस वाले का नाम आ गया.
Tuesday, October 13, 2009
पुलिस और धर्मनिरपेक्षता
मैं एक थानेदार महोदय को जानता हूं. एक निरीक्षकोचित सभी गुण हैं उनके अन्दर. बड़े कड़क हैं और काफी समृद्ध भी हो चुके हैं जिसके बारे में फिर कभी चर्चा करूंगा. इसके साथ ही सम्भवत: दो व्यक्ति उनकी हवालात में आत्महत्या (?) भी कर चुके हैं, जिससे आप उनके बारे में अन्दाजा लगा सकते हैं. लेकिन मैं इसकी भी बात नहीं कर रहा. अभी होली पर मैंने उन्हें कुछ लड़कों को लठियाते हुये देखा था जो बदतमीजी कर रहे थे. खैर मैंने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया क्योंकि यह तो पुलिस वालों का पैदायशी हक भी है और गुण या कला जो भी कह लें. अभी मुझे उनके साथ ईद वाले दिन जाने का सौभाग्य प्राप्त हो गया. उनकी गाड़ी में जिस पर बत्ती लगी हुई थी और एक हूटर भी जो उनके या कह लें पुलिस वालों के नाजायज अधिकार दिखाने का प्रतीक है. उस दिन उन्होंने उसी चौराहे पर गाड़ी रुकवा दी जहां मैं होली वाले दिन उन्हें कुछ लड़कों को लठियाते देख चुका था. कुछ ही देर में पांच-छ: मोटर-साइकिलें बड़ी तेजी से गुजरीं जिसमें हरएक पर तीन-तीन लड़के गोल टोपी लगाये बैठे हुये थे. जाहिर था कि पहनावे से मुस्लिम लग रहे थे. चूंकि महोदय बड़े सख्त किस्म के अफसर हैं इसलिये उन्हें यह सब अनदेखा करते देखकर मुझे अटपटा लगा. मैंने बात छेड़ी तो कहने लगे अगर मैं आज इनका चालान कर देता हूं या किसी को पकड़कर दो-चार हाथ मार देता हूं तो आधे घंटे के अन्दर थाने पर हजारों की भीड़ इकठ्ठी हो जायेगी. फलां-फलां मजलिस के नेता यहां आ जायेंगे और फिर स्थानीय सभासद से लेकर मन्त्री तक इनकी हिमायत में आ जायेंगे. सीओ से लेकर आईजी तक चढ़ बैठेंगे. इनके हिमायती और नेता त्योहार का हवाला देंगे और उल्टा मुझे दोष देने लगेंगे. थाने पर तमाम लोग निगाह गड़ाये बैठे रहते हैं, इनका तो कुछ होगा नहीं और मुझे जरूर लाइन भेज दिया जायेगा. धर्मनिरपेक्षता की कलई यहीं पर खुल जाती है.
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